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असंतुलित भाषा। – Aavishkaar

असंतुलित भाषा।

मैं हिंदी भाषी हूँ!

पढ़ता हूँ! लिखता हूँ! बात करता हूँ! 

और यहाँ तक की सोचता भी इसी भाषा में ही हूँ।

क्योंकि……

मैं हिंदी भाषी हूँ!

 

अपने को अभिव्यक्त करने के लिए इसी को माध्यम बनाया है। अपनी बात अच्छे से कर पाता हूँ, पूरी स्पष्टता से अपनी बात को समझा भी पाता हूँ। क़िस्से कहानी, कविता तमाम इसी में रच पाता हूँ,

मैं हिंदी भाषी हूँ!

आगे आप जो कुछ पड़ेंगे वो मेरी(एक हिंदी भाषी) की कहानी हैं जो अनुभव से आई हैं।

“अगर आप मेरी तरह सोचने वालों में से हैं तो यह ज़रूर सोच रहे होंगे की हिंदी भाषी हो तो क्या मज़ाक बना अब तक या नहीं”। मैं इसका जवाब दूंगा। हाँ, पहले बनता था लेकिन अब नहीं।

मज़ाक तो बना मगर अब ऐसी जगह हूँ जहाँ मेरी इस क़ाबलियत को सराहा गया और बताया गया कि ये कमज़ोरी नहीं ताक़त हैं। जिसका प्रदर्शन भी करना कुछ हद तक सीख चुका हूँ। वो ऐसे, की हर महीने अपने अनुभवों को ब्लॉग के माध्यम से आप तक अपनी बात को पहुंचने में सक्षम जो हो पाया हूँ। मगर अपनी इस ख़ूबी पर घमंड करना सही तो हैं मगर इतना भी नहीं की उसी में या उतने तक ही सीमित रह जाऊँ। 

इसकी समझ मैंने ऐसे बनाई,

एक भाषा चाहे कोई भी हो वो एक संस्कृति समाज को दर्शाती हैं, जिसमें छुपी उसकी भावना और उसकी सभ्यता का उपन्यास का लेखा-झोखा होता हैं। केवल अपने या एक ही लेखे-झोखे तक ही ख़ुद को बांध कर रख लेना शायद ग़लत हो सकता हैं। ऐसा होने से किसी और संस्कृति का आचरण अपने तक न आ पाने और दो संस्कृतियों के संगम से होने वाले अमृत मंथन के रसपान से वंचित कर देने जैसी संभावना को बना देता हैं।

और स्पष्टता मुझको कुछ इस तरह समझ आई….

जैसे इस माह आविष्कार में गैबी नाम की एक शोधकर्ता का आना हुआ। जो किसी अन्य संस्कृति अर्थात भाषा की थी। उनके आने का मक़सद विज्ञान की असीम ताक़तों से हमको परिचित करवाना था। जो कुछ भी उन्होंने अपने समाज में रहते हुए शोध किए हो, उनको दूसरे समाज के साथ साझा करना था।

अब दो विविध संस्कृतियों के बीच उठे इस क़दम में आदान-प्रदान द्वारा शिक्षा की और बेहतरी पर पहल करनी थी। पहल करने की बात तो हो चुकी थी मगर इसको संभव करने के लिए दोनों संस्कृतियों के बीच बातचीत होनी ज़रूरी थी।

असल परेशानी तो अब शुरू हुई……

मैं ठहरा हिंदी भाषी जिसको हिंदी के अलावा कोई और भाषा समझ में नहीं आती थी उसी प्रकार गैबी को भी अंग्रेजी भाषा के अलावा कोई और भाषा समझ में नहीं आती थी। यह मेरे लिए बहुत ही असमंजस की बात रही क्योंकि बिना बात कोई आदान-प्रदान संभव कैसे हो सके।

इस भाषा के अवरोध ने मुझे मेरी ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया। जिसने मुझे मेरे छोटे से घोंसले से बाहर आने पर ज़ोर दिया। मैं अपनी हिंदी भाषा में इतना विलुप्त था कि अंग्रेज़ी भाषा सीखने पर कभी सोचा ही नहीं, कभी सोचा ही नहीं कि इसकी ज़रूरत क्या हो सकती हैं या इससे मेरे जीवन में और क्या अवसर खुल सकते हैं।

कोशिशें काफी की अपनी तरफ से और मेरे साथ सिखाने वालों का भी सहयोग बहुत मिला जिसकी बदौलत दो संस्कृति के मिलन से एक शिक्षण का विषय तैयार हो पाया। जिसका शीर्षक “सुक्षमजीव: एक अदृश्य दुनिया” रखा गया। इस विषय को मैं अपनी और कुछ अन्य लोगों की कक्षाओं में लेकर गया जहाँ इस विषय को बहुत ही पसंद किया गया और पढ़ाने की विधि को वहाँ के शिक्षकों ने सराहा भी।

अपनी भाषा पर घमंड करना अच्छा हैं मगर इतना भी नहीं कि बस उसी तक सीमित रहो। दुनिया में और भी बहुत सी चीजें हैं जिनसे हम अनजान हैं। उसको जानने के लिए जिज्ञासा होना तो ज़रूरी हैं ही मगर उससे परिचित होने के लिए अपने आराम के क्षेत्र की बेड़ियों को तोड़ उससे बाहर आने का प्रयत्न भी करना होगा।


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