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एक दास्तां जिसे मैं सिर्फ इंसानों के साथ ही साझा करना चाहता हूं। – Aavishkaar

एक दास्तां जिसे मैं सिर्फ इंसानों के साथ ही साझा करना चाहता हूं।

 

मैं हमेशा से ही इस प्रश्न का जवाब जानने में काफी दिलचस्पी रखता था कि धरती पर डायनासोर, वनमानुष, सफेद गैंडे या फिर फला-फला पक्षी या जानवर धरती से किस प्रकार विलुप्त हो गये? मुझे उनके बारे में पढ़कर अचम्भा होता था कि क्या वाकई में पहले इतने बड़े-बड़े जीव होते थे? उससे भी ज़्यादा अचंभा उनके विलुप्त होने पर होता है। पर हाल के दिनों को देखकर अब वो सारी बातें अजीब नहीं लगती हैं। 

ऐसी ही एक काल्पनिक कहानी आने वाले कल की…… जो आपके सामने पेश करने की कोशिश करी है मैंने..

सूरज का आकार कुछ बड़ा हो चला है, धरती अब और भी गर्माहट समेटे सूरज के चक्कर लगा रही है। तपती गर्मी को बर्दाश्त कर पाने वाले जीव ही धरती पर बचे हैं। अब हर साल मौसम करवट नही बदलता है कि जब चाहें बारिश, बर्फ-बारी या जमा देने वाली ठंडी पड़ जाए या फिर ओलों की मार पड़ जाए। न, अब ऐसा नही होता। धरती की प्रजातियां अब प्रदूषण का रोना नही रोते, धरती पर रौनक अब ग्यारह मास रहती है, ग्यारह मास!

अब मौसम ठहराव लिए आते हैं। जब वसंत आता तो चारों ओर हरियाली बिखर जाती और चारों ओर ताज़गी, नव जीवन दिखाई पड़ता। हवा, फूलों की सुगंध को छितिज तक फैलाते जाने की कोशिश मे बहती चली जाती। आज भी धरती ख़ुद को फूलों से वैसे ही सजाती जैसे इंसानों के ज़माने मे सजाती थी। पर अब धरती जैसे सच्ची ख़ूबसूरती लिए हुए है, इस पर पनपे जीवन के साथ खुश है।

 

ऐसे ही किसी मन-मोहक वसंत को ‘परछन’ (काल्पनिक) नामक प्रजाति के दो नौजवान इस धरती के रूपों को जानने की उत्सुकता में अपने चारों पैरों पर घर से निकल पड़े हैं। वो एक-दूसरे से बतियाते हुए धुंध को छांटते चले जा रहे थे।

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परछन।

वो बतियाते, “तुमका पता हई कि हम सुने है धरती पा हज़ार साल पहिल दुइ पैरन वालों जानवर राहत हतो।”  दूसरा बोलता, “ऐसो कछु नाई हइ, असल-मा तुम बौरिया गए हो। इन सब मनघडंत बातन काजे न मानौ करौ।” 

यूँ बातों के सिलसिले के साथ उनके चारो क़दम घोड़े के जैसे हवा को चीरते जा रहे थे। और वे अपने सामने असीम वीरान पड़े छितिज को पार करने की कोशिश में आगे चले जा रहे थे। 

इस वीरानता से पार जब वो दोनों पहुंचे तो उनकी आँखों के सामने हरियाली ही हरियाली बिखरी पड़ी थी। उनके कानों मे चिड़ियों की आवाज़ें पहुँच रहीं थी, वो दोनों एक बगीचे में खड़े थे। वे दोनों वहीं ठहर गए, फाख्ता पक्षी की आवाज़ ने जैसे सबकुछ मद्धम कर दिया। थकावट से जो उत्सुकता ठंडी पड़ चुकी थी अब जाग चुकी है, थकावट जा चुकी है और मन शांत हो चुका है। वहीं अबाबील नामक पक्षी जो काले सफेद रंग में बिना बोले ही दोनों का ध्यान आकर्षित कर रहा था। परचनू पक्षी जो आकार मे छोटा और चुलबुला, जब उसपर भोर की लालिमा गिरती तो प्रकाश अपने सातो रंग उजागर कर देता। ऐसी मनोहर छटा देखते-देखते कब दिन चढ़ गया, उन्हें पता ही नही चला। भूख मिटाने को दोनों ने आडू, कैथ के फल खाए तत्पश्चात बगीचे से दोनो नौजवान न चाहते हुए भी आगे चल पड़े।

कुछ दूर चलते ही दोनों परचनों की एक छोटी बस्ती में जा पहुंचे। मुश्किल से 20 घर ही होंगे उस बस्ती में। घर क्या छोटी सी झोपड़ी ही बोलें, जो मिट्टी से बनी है और दो बाँस के खम्म्बों पर टिके फूस के छप्पर के सहारे टिकी हैं। दोनो ही नौजवान वहां के लोगो से बात करते, उनमें से बस्ती के एक शख्श ने बताया की बस्ती से कुछ दूर पूर्व में गांव के लोगों को कई साल से खुदाई मे तरह तरह तरह के सामान मिल रहे हैं। कभी ईंटें, पहिये, मकान, गाड़ी मिलते तो कभी-कभी पूरे के पूरे घर निकल आते हैं। लोग कहते हैं की देवता ज़मीन में रहते हैं, जब उनकी कृपा होती है तो ज़मीन से अच्छा समान मिलता है। जब देवता नाराज़ होते हैं तो हड्डी के कंकाल हमे देते हैं। क्योंकि खुदाई में दो पैर वाले जानवर निकलते हैं इसलिए कुछ लोगों का कहना हैं कि हज़ार साल पहले धरती पर दो पैर वाला जानवर रहता था, उसे इंसान बोला जाता था। 

 

लोग बोलते हैं कि उसने अपने अंतिम समय पर बहुत तबाही मचाई थी। वो हर चीज़ से छेड़छाड़ करने लगा था। नदियों पर अपनी मनमानी कर उन्हें मोड़ देता, जमीन को खोद-खोद कर बर्बाद कर अपना काम निकलवाता, उसने पहाड़ों, जंगलों को काट डाला, नदियों को गंदा कर बर्बाद कर डाला। वो जानवरों, पक्षियों की ज़िन्दगी में दखल करता था, उनके शरीर के साथ खिलवाड़ करता, उनके अंगों से अपने इस्तेमाल की चीजें बनाता। सभी उससे तंग आ गए थे, यहां तक कि धरती भी। मौसम चक्र बिगड़ चुका था, धरती गर्म होने लगी थी, उसने धरती की आसमानी चादर (ओज़ोन) मे गड्ढा कर दिया था। कई पक्षी, जीव-जंतुओं की प्रजातियां विलुप्त हो गईं। जो पक्षी उस गर्माहट मे ख़ुद को ढाल पाए, वो बच गए। उनमें से एक हम लोग हैं। देखो अपने को, मुश्किल से ही बाल के अंदर की मोटी खाल दिख पाती है, वहीं इंसान की किताबों में देखो तो उसके बाल ही कहा होते थे। 

उनमे से एक नौजवान बोला, “इंसान ये सब करता था! हम लोगों से पहले इंसान धरती पर रहते थे, जो मर गए! पर वो मरे कैसे, ऐसा क्या हुआ था?”

बताता हूँ। सुना है कि धरती उन्हें समय-समय पर चेतावनी देती रहती थी। कभी सुनामी तो कभी बाढ़, भूकंप, हिमस्खलन आदि के माध्यम से। पर वे सभी इंसान आपसी होड़ में इसे नज़रअंदाज़ करते रहे और एक अंधी दौड़ में दौड़ते रहे। उस दौड़ का आयोजन उन्होंने खुद ही किया था। इस आयोजन में आयोजक और प्रतिभागी सभी इस दौड़ का हिस्सा थे। 

जैसे आज हम लोग उस दो पैरों वाले जानवर ( इंसान) को ज़मीन से खोद कर निकालते हैं फिर उनका अध्ययन करते हैं। वैसे ही इंसानों की किताबों से पता चला है कि वो भी एक बड़े जीव डायनासोर (जो इंसान से पहले विलुप्त हुए थे) को ज़मीन से खोदकर उनपर अध्ययन करता था।  

हमारी बस्ती के विशेषज्ञ बताते हैं कि इंसान काफी समझदार था, उसने नई-नई तकनीकें विकसित की तथा कई समस्याओं का निदान कर अपनी ज़िंदगी आसान कर ली। वो साफ हवा को छूकर बहुत खुश हो जाता था।

“क्या, हवा को छूकर खुश हो जाता था?”, एक नौजवान ने पूछा। पर क्यों?

शायद उसने अधिकतर जगह की हवा को गंदा कर दिया था। इस कारण साफ हवा को छूकर वो खुश होता था।  फिर उसने अपनी ज़िंदगी को और भी आसान करने के लालच मे धरती की अन्य प्रजातियों के जीवन मे दखल करने लगा, जो उसे ले डूबा।

एक रोज़ एक विचित्र बीमारी धरती पर पनपी जिसने पूरी इंसानी प्रजाति को हिला डाला। इस बीमारी का इलाज इंसानों के पास नही था। इस कारण इंसानों को एक दूसरे से मिलना जुलना छोड़ना पड़ा। उसने कुछ महीने अपने-अपने घरों में रहकर ज़िंदगी बिताई। अपने बड़े-बड़े आशियाने, जिन्हें उन्होंने अपना पूरा जीवन लगाकर बनाया था,  उनमे उन्हें घुटन होने लगी थी। कई इंसानों को इस दौरान धरती के साथ अपनी की गई ग़लतियों का एहसास हुआ था। उन्होंने आगे से अंधी दौड़ का हिस्सा न बनने का संकल्प लिया। पर ये संख्या बहुत कम थी, ढेरों इंसान अब भी थे जो पैसे का मोह छोड़ नही पाए थे। वे अब भी अपने व्यवसाय में ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा चाहते थे। इस बीमारी के थोड़ा सा कम होने पर इंसान फिर उस दौड़ में लग गए……। 

दूसरा नौजवान बोला, “फिर क्या हुआ इंसानों का।”

बस्ती का आदमी उन दोनों नौजवान से बोला, “अगर वो होते तो मैं तुम्हें ये कहानी नही सुना रहा होता।…….

 

पर मैं ‘एक इंसान’, तहे दिल से चाहता हूं कि आप जीवित रहो।

आप जीवित रहो इस धरती को ख़ूबसूरत बनाने के लिए, 

अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस धरती को ख़ूबसूरत बनाने का मौका देने के लिये, इसे जीने के लिए। 

 

आप जीवित रहो इस कहानी के जैसे आने वाली सभी कहानियों को पढ़ने के लिए, 

इस ब्रह्मांड के रहस्यों का पता लगाने के लिए।

आप जीवित रहो अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस ख़ूबसूरत होती जा रही धरती के सौंदर्य को देखने के लिए।

 

आप जीवित रहो…….

तो आज हम इंसानों की दुनिया ऐसी कगार पर पहुंच गई है जहां लोग दुकान जाकर अपनी ज़रूरत का सामान खरीदने से भी कतरा रहे हैं, लोग घर से निकल नही सकते, एक दूसरे से मिल नही सकते, लोग घुट रहे हैं अपने ही खूबसूरत आशियाने मे। पर क्या हम फिर से आज़ाद हो सकेंगे।

 

मुझे उम्मीद है आपके (इंसानों) सहयोग से सब ठीक हो जाएगा। मुझे पता है कि आप मेरी इस बेतुकी सी कहानी को परछनों के हाथ लगने से बचाओगे। इस काल्पनिक कहानी को ग़लत साबित करने मे आप मेरी मदद करोगे।

 

आपसे अपरिचित इंसान 

दिव्यांशु।


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