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मेरी गणित की समझ बनने और बनाने तक का मेरा अनुभव एवं उसमे हुई तबदीली – Aavishkaar

मेरी गणित की समझ बनने और बनाने तक का मेरा अनुभव एवं उसमे हुई तबदीली

सीखने और समझ बनाने में बहुत अंतर को दर्शाते हुए

कई लोगो के मुँह से ये बाते अक्सर सुनने को मिली हैं मुझे कि गणित लड़कियों की बस की बात नहीं है। गणित सीखना, गणित हल करना, गणित की पढ़ाई करना आदि फ़िज़ूल बातें हैं। पर मुझे आज तक ये पता नहीं चला कि आखिर ऐसी क्या बात है कि लोग ये सोच पाते हैं कि गणित लड़कियों की बस की बात ही नहीं है गणित सीखना ? उनके क्या ऐसे तर्क है जिससे उनके ज़ेहन में गणित की कमजोरी के नाम पर लड़कियों की क्षवी नज़र आती है ? मेरे यह लिखने से ये तात्यपर्य नहीं है कि मैं केवल पुरुषों को लेकर टिप्पणी कर रही हूँ। मेरे इस तरह की बातों में वे महिलाएं या लड़कियां भी शामिल है जिनको ऐसा लगता है कि गणित उनके समझ से बाहर है। 

मेरा नाम निधि है। केवल नाम बताना ही मेरी पहचान तो नहीं , इसके आगे भी बहुत कुछ बताना मेरी पहचान है जैसे मैं पिछले सात महीनों से आविष्कार और साझे सपने नाम की संस्थाओं में प्राथमिक शिक्षक की प्रशिक्षण कर रही  हूँ। इसके साथ ही बच्चो का विकास किस तरह से होता है उनकी भावनाओं को समझना आदि की जानकारी  मुझे अश्वत्था संस्था  से मिल रही है।  

मेरी गणित की समझ एवं पहले की समझ में हुई कुछ तब्दीलियां

गणित में निपूर्ण तो नहीं और न ही  ज्यादा अनुभवी हूँ पर इन सात महीनों में मैंने जितनी  भी गणित की समझ बनायीं है उससे ऐसा लगता है कि काश हमें शुरू से ही ऐसे  गणित पढ़ाया जाता, तो शायद आज लोग ये नहीं कहते कि गणित हमारे बस की बात नहीं है। मैंने आविष्कार में गणित के हर एक विषय की समझ प्रयोग कर के बनाई है जैसे,  यदि मुझ में भिन्न की समझ बनानी है तो सबसे पहले हमे ये सोचना होगा कि बच्चे किस तरह से सिखने में सक्षम हैं। यदि हमे उनमे आधा, चौथाई, तिहाई क्या होता है इसकी समझ बनानी है तो उन्हे उस तरह के ही उदहारण देंगे जिस तरह की वस्तुओं से वे परिचित हैं। यदि बच्चे गांव के हैं और उन्हें कहेंगे कि एक पिज़्ज़ा है, उसके 6 भाग  करते हैं तो उसका एक भाग क्या कहलायेगा, तो इसका उत्तर तो शायद बोल भी दे लेकिन वे अपनी जिंदगी से जोड़ नहीं पाएंगे और जब जिंदगी से नहीं जोड़ पाएंगे तब उनकी समझ बनेगी ही नहीं और वे कभी इसका प्रयोग ही नहीं करना चाहेंगे।

एक पूरी रोटी

पिज़्ज़ा की जगह यदि हम बच्चो को भिन्न सिखाते समय ये उदाहरण दें कि आपके पास एक रोटी है और आपको इस रोटी के दो लोगो में बराबर बराबर बांटना है तो हर एक के हिस्से में कितने रोटी के भाग आएंगे तो उस बच्चे के मन में उस एक रोटी की तस्वीर बनने लगेगी और वो करने लग जायेगा की हमारे पास दो लोग हैं और मैं उनमे रोटियों को दो बराबर हिस्सों में बाँट रही हूँ।  तो वो बता सकती है कि हर एक के हिस्से में आधी आधी रोटी आएगी।  

पहले मेरी केवल सीख थी कि इस तरह से गणित बनाया जाता है जिसमे फॉर्मूले होते है।  भिन्न की बात करूँ तो उसमे केवल लगता था कि दो ऐसी संख्याएँ हैं जो की एक रेखा के ऊपर होती है और दूसरी संख्या रेखा के नीचे होती है पर ऐसा क्यों होता है आज तक पता नहीं था। पर अब मेरी समझ बन गयी है कि जो संख्या पड़ी रेखा के नीचे लिखी जाती है वो ये दर्शाती है कि कितने भाग मिलाकर पूरा एक बनाते हैं और उसके जैसे कितने भाग लिए गए हैं,  वो पड़ी रेखा के ऊपर लिखा गया है।   

सीखने और सिखाने के दौरान मेरी कौशल

सीखने और सिखाने से मेरा तात्पर्य पढ़ने और पढ़ाने से है। जब मैंने बच्चो को पहली बार पढ़ाना शुरू किया तो उस समय मुझे काफी डर लगता था। पर अब मैं उनसे बहुत चीजे सीख गयी हूँ,  जैसे पढ़ाने से पहले मेरी क्या तैयारी होनी चाहिए।  उनके लिए पाठ की योजना बनाना , प्रस्तुति (presentation) बनाना, feedback लेना सभी चीजे सीख गयी हूँ। अपनी बातों को उनके पास किस तरह से रखूं कि वो एक बार में समझ पाए ये तो अभी मुझे सीखना बाकी है पर मैं उनसे इस तरह से बात कर पाती हूँ जिससे वो आसानी से समझ पाते हैं।

मूल्य

मूल्य से मेरा उतना खास मतलब तो है नहीं, और न ही मुझे मूल्य के बारे में खुछ खास पता है, लेकिन मेरे मूल्य क्या है मेरी जिंदगी में वो कहना आसान होगा। मैं ये तो नहीं कहती हूँ कि मुझ से सारे काम हो ही जाते है पर जो भी काम करने को मिलता है, उसे जल्दबाज़ी में नहीं, समय लेकर ही करती हूँ। अगर कोई काम समूह में करने को मिल जाए तो उसे भी मैं बहुत ही निष्ठा से करती हूँ। इस तरह मेरी गणित की समझ बनी और मेरी सोच कुछ इस तरह से बदली।

-Nidhi Kumari, Aarohan Fellow 2021


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